जाती के नाम पर खुदको न बांटे

2018-04-10T17:33:11+00:00 April 10th, 2018|Categories: Blog, Hindi|

कुदरत ने हम सभी मनुष्यों को शारीरिक बनावट, रंग-रूप व आहार के आधार पर एक जैसा ही बनाया हैं, इसके बावजूद भी हम मनुष्योंने खुदको जात-पात के आधार पर इस कदर बाँट दिया हैं की आज समस्त संसार इस एक बात के कारण जैसे कई टुकडो में बंट गया हैं । जी हाँ ! गौर से यदि सोचा जाएँ तो क्या इश्वर ने कभी यह कहा हैं की तुम हिन्दू, तुम मुसलमान, तूम इसाई या तुम सिख हो .. कहा हैं कभी ? इसका स्पष्ट उत्तर हैं ‘कभी भी नहीं ’ । अब,जब बनानेवाले ने हममे कोई भेदभाव नहीं रखा, तो फिर हमने क्यों खुदको जातियों के आधार पर बाँट दिया ? यदि एक शीशी में हिंदू का खून लिया जाये, दूसरी में किसी मुस्लिम का और वह दुनिया की किसी भी पैथोलोजी लैब में जाँच के लिए भेजा जाये, तो क्या कोई बता पायेगा कि यह खून हिंदू का और वह मुस्लिम का है? यहाँ मेडिकल साइंस भी फेल है क्योंकि प्रकृति ने सभी इंसानों में एक जैसा ही खून बनाया है, तो भला जाति के आधार पर उस खून का बँटवारा कैसे हो सकता है? इसी प्रकार से आये दिन विश्वभरमे कई लोगों की आकस्मिक मृत्यु होती हैं, तो क्या कोई यह निर्णय कर पायेगा कि दुर्घटना में जिनकी मृत्यु हुई, उनमे से कौनसा शव किस जाति का है? शायद नहीं!  

एक बार किसी कुँवारी कन्या ने लोकलाज के भय से अपने नवजात शिशु को सड़क के किनारे एक झाड़ी में फेंक दिया। सड़क से गुज़रते एक मौलवी की निगाह उस बच्चे पर पड़ी तो देखा, एक सर्प फन फैलाये बच्चे की रक्षा कर रहा है। यह द्रश्य देखकर मौलवी ने आश्चर्यवत् होकर कहा -`वाह रे खुदा, तेरी कुदरत! जन्म देनेवाली माँ मरनेको छोड़ गई और मारने वाला सर्प बचा रहा है।’ मित्रों, क्या आप बता सकेंगे कि वह बच्चा किस जाति का था? हाँ, इतना तो सभी कह देंगे कि इंसान की औलाद अर्थात् इंसान की जाति का ही है। तो यह जाति का बंटवारा आखिर किसने किया?, क्यों किया?, कब किया?, किस उद्देश्य से किया?, इसका कुछ अता-पता हममेसे किसीको नहीं है। हो सकता है, सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु उस समय की आवश्यक माँग रही हो, परन्तु आज के परिवेश में यह जाति-भेद एक खतरनाक और जानलेवा जहर साबित हुआ है जो संपूर्ण मानवता का गला घोंट रहा है।

आजकल प्रति दिन हमें अखबारों में पढ़ने को मिलता है – एक ०६ साल की अबोध बालिका के साथ बलात्कार कर,हत्या कर उसे नदी में फेंक दिया गया, स्कूली बच्चा उठा लिया गया और फिरौती का भुगतान न होने पर बच्चे को मार डाला गया, विवाहिता को दहेज़ के नाम पर ससुराल वालों ने जिंदा जला दिया,बेटे ने जायदाद के नाम पर बाप को कुल्हाड़ी से काट डाला,दो बच्चों की माँ अपने पति और बच्चो को छोडकर प्रेमी के साथ फरार हो गई, कब्र से नर-कंकाल निकाल विदेशों में भेजा गया,बहन ने प्रेम-प्रपंच में बाधक भाई की हत्या करा दी। ज़रा सोचिये, ये कर्म मानवीय मूल्यों से सुसज्जित मानव के हैं या ?

कहा गया है कि मानव विवेकशील प्राणी है,परन्तु आज उसका विवेक कहाँ चला गया है? चलती ट्रेन में बम ब्लास्ट कर अनेक निर्दोशो की जान लेना, धर्म-स्थान पर हंगामा कराकर हज़ारों को मौत के मुँह में झोंक देना, सांप्रदायिक दंगा कराकर सैकड़ों के खून से खिलवाड़ करना, क्या ये सब विवेकशील प्राणी के कर्म हैं? धिक्कार है मानव के ऐसे विवेक पर और लानत है ऐसी दानवता पर। आज मानव ने अपनी मानवता को सांप्रदायिकता की भयंकर आग में झोंक दिया है जिसमें पूरा विश्व जल रहा है। अपने मूल जाति व धर्म को भूलकर मनुष्य ने स्वयं को अनेक जातियों, उपजातियों, धर्मों व उपधर्मों में विभाजित कर, एक-दूसरे के प्रति नफरत एवं हैवानियत का बीज बो दिया है जिसके फलस्वरूप आज देश-विदेश एक-दूसरे के खून के प्यासे बन पड़े हैं। कहीं आतंकवाद तो कहीं उग्रवाद, कहीं जातीवाद तो कहीं भाषावाद, कहीं धर्म के नाम पर धर्मयुद्ध ने तो कहीं जाति के नाम पर जातियुद्ध ने संपूर्ण विश्व में ज़हर भर दिया है। अनाचार, पापाचार,दुराचार, लूट-खसोट का चारों और साम्राज्य फैला हुआ है। विश्व की ऐसी दुर्दशा पर गीता के भगवान का दिया हुआ वचन `यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे सत्य साबित होता दिख है।

 स्मरण रहे ! निकट भविष्य में एक ऐसे युग का आना निश्चित है जहाँ लोग सुख-शांति, प्रेम-पवित्रता से सुसज्जित राज्य-भाग्य प्राप्त करेंगे। जहाँ न होगा जाति-भेद, न होगा धर्म-भेद, होगा तो सिर्फ एक राज्य और एक भाषा। जहाँ सभी लोग दैवी गुणों से परिपूर्ण, संपूर्ण निर्विकारी होंगे। कोई निर्धन, रोगी, दुःखी नहीं होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि इस कलियुग के बाद एक ऐसा भी सत्य का युग आयेगा, जो सतयुग के नाम से जाना जायेगा? क्या आप आना चाहेंगे ऐसी दुनिया में ? यदि हाँ ! तो चलिए खुदको जाती के नाम पर बाँटना छोड़े और एक मानवता के अपने मूल धर्म का पालन करें, यही हैं उस नइ दुनिया में जानेकी सरल विधि।

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